Saturday, December 11, 2010
A whistle blower suffers for raising voice
A whistle blower suffers for raising voice against corruption in DVC Friday December 10, 2010 Calcutta A K Jain, Deputy Chief Engineer Damodar Valley Corporation blew the whistle against corruption and mismanagement in the corporation five years ago and fought different battles leading to repatriation of high officials but he is waiting for his long overdue promotion. READ
Monday, December 6, 2010
Four information commissioners skip RTI meet
The Telegraph, 06-12-2010
Arvind Kejriwal takes umbrage at blatant violation of act by state body
Ranchi, Dec. 5: A public hearing on the right to information (RTI) Act in the capital and only two of the six state information commissioners show up, baring a blundering and laggard organisation that passes as the sentinel of truth in Jharkhand. READ
The Telegraph, 06-12-2010
Arvind Kejriwal takes umbrage at blatant violation of act by state body
Ranchi, Dec. 5: A public hearing on the right to information (RTI) Act in the capital and only two of the six state information commissioners show up, baring a blundering and laggard organisation that passes as the sentinel of truth in Jharkhand. READ
Friday, October 15, 2010
RTI Forum felicitates 11 for their vigilance
The RTI enabling every Indian citizen to seek information from a public authority, to be given within 30 days — completed five years on Tuesday. People have used the Act to question, probe, demand transparency and voice dissent. Meet 11 citizen vigilantes of the state, who were felicitated by Jharkhand RTI Forum on Tuesday in the capital for ushering in winds of change. READ
Thursday, October 14, 2010
अधिकारियों के लिए भी मददगार आरटीआइ
पहले कुछ अधिकारियों में धारणा थी कि आरटीआइ से उन्हें परेशानी है। लेकिन अब अधिकारी भी अपने हित में इसका उपयोग कर रहे हैं। पलामू की उपायुक्त श्रीमती पूजा सिंहल को एक आरोप की सच्चाई सामने लाने के लिए आरटीआइ की मदद मिली। झारखंड के ही एक आइएएस को सीबीआइ व आयकर की कार्रवाई से राहत में आरटीआइ का उपयोग हुआ। इस कानून ने देश को एक सकारात्मक दिशा दी है। READ
Wednesday, October 13, 2010
Saturday, October 9, 2010
बिकाऊ है भारत सरकार, बोलो खरीदोगे ?
अरविन्द केजरीवाल
90 के दशक के अंत में आयकर विभाग ने कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों का सर्वे किया। सर्वे में ये कंपनियां रंगे हाथों टैक्स की चोरी करते पायी गयीं, उन्होंने सीधे अपना जुर्म कबूल किया और बिना कोई अपील किये सारा टैक्स जमा कर दिया। अगर ये लोग किसी और देश में होते तो अभी तक उनके वरिष्ठ अधिकारियों को जेल भेज दिया गया होता। एक कम्पनी पर सर्वे के दौरान उस कम्पनी के विदेशी मुखिया ने आयकर टीम को धमकी दी - ‘‘आपको पता नहीं हम कितने ताकतवर हैं। हम आपकी संसद से कोई भी कानून पारित करा सकते हैं। आप लोगों का तबादला भी करा सकते हैं।’’ कुछ दिन बाद ही इस आयकर टीम के एक हेड का तबादला कर दिया गया। READ
Saturday, October 2, 2010
आरटीआइ से मिली छात्रवृति
रांची विवि ने गरीब विद्यार्थियों को छला
विष्णु राजगढ़िया
रांची: बीपीएल श्रेणी के सैकड़ों छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा की सुविधा और छात्रवृति की राशि से वंचित होना पड़ा है। रांची विश्वविद्यालय में नौकरशाही कार्यशैली का खामियाजा गरीब विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है। इससे लोककल्याणकारी राज्य की भी कलई खुल गयी है।
रांची विश्वविद्यालय के कुलपति ने 30 अगस्त 2007 को आदेश संख्या 735/07 के माध्यम से गरीब विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण घोषणा की थी। तत्कालीन राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी की पहल पर यह घोषणा हुई थी। इसमें प्रावधान था कि रांची विश्वविद्यालय के प्रत्येक स्नातकोत्तर विभाग में बीपीएल श्रेणी के दो-दो विद्यार्थियों का निशुल्क नामांकन होगा। उन्हें हर तरह का शुल्क माफ करने के साथ ही प्रतिमाह 500 रुपये छात्रवृति का भी प्रावधान रखा गया। इसे वर्ष 2007 से प्रत्येक सत्र में लागू करने की अधिसूचना निकाली गयी। लेकिन किसी भी विभाग ने इसे लागू करने की जरूरत नहीं समझी।
इस दौरान जिन छात्र-छात्राआंे ने अपना यह अधिकार हासिल करने का प्रयास किया, उन्हें उपेक्षा और अपमान का शिकार होना पड़ा। राजनीति विज्ञान की छात्रा पुष्पा कुमारी भी उनमें एक थी। इस बीच पुष्पा के भाई मुकेश कुमार गुप्ता ने झारखंड सरकार के श्रीकृष्ण लोक प्रशिक्षण संस्थान में सूचना कानून का प्रशिक्षण हासिल किया। भाई की मदद से पुष्पा कुमारी ने रांची विश्वविद्यालय से सूचना मांगी कि प्रत्येक सत्र में प्रत्येक विभाग ने किन छात्र-छात्राओं को निशुल्क शिक्षा और छात्रवृति प्रदान की। इस आवेदन के दबाव में रांची विश्वविद्यालय ने पुष्पा कुमारी को छात्रवृति की राशि प्रदान कर दी। उसके बैच के एक अन्य विद्यार्थी को भी यह राशि मिल गयी। रांची विश्वविद्यालय के 23 विभागों से मिली सूचना के अनुसार किसी भी विभाग ने उक्त आदेश का पालन नहीं किया था। जाहिर है कि सूचना कानून के कारण ही पुष्पा को छात्रवृति की राशि मिल सकी है। अब पुष्पा और मुकेश ने इस प्रावधान की जानकारी अधिक से अधिक गरीब विद्यार्थियों तक पहुंचाकर उन्हें इसका समुचित लाभ दिलाने का बीड़ा उठाया है। झारखंड आरटीआइ फोरम ने 12 अक्तूबर को सूचना कानून की पांचवीं वर्षगांठ पर पुष्पा कुमारी को आरटीआइ सिटिजन अवार्ड देने की घोषणा की है।
Thursday, September 30, 2010
सूचना कानून के पांच वर्ष पर अरुणा राय एवं निखिल डे की टिप्पणी
Wednesday, September 29, 2010
दिख रहा है सूचना कानून का जादू
-संदीप पांडेय
सूचना कानून के पांच वर्ष के अनुभवों पर मैगसेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय के विचार
पांच साल पहले जब सूचना कानून बना था तो इसने काफी उममीदें जगायी थीं। लेकिन धीर-धीरेे इसका प्रभाव कम हो गया। पहले अधिकारियों में एक डर था कि सूचना नहीं देने पर सजा मिलेगी। लेकिन अब वह समझ गये हैं कि सूचना आयोग कोई कठोर भूमिका नहीं निभायेगा। इसलिए अब अधिकारियों ने सूचना नहीं देने के तरह-तरह के बहाने ढूंढ़ने शुरू कर दिये हैं।
इसकेे बावजूद सूचना कानून ने अपना जादू तो दिखा ही दिया है। इसने नौकरशाही और आम जनता के बीच के संबंधों पर जबरदस्त असर डाला है। अगर यह क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं तो एक गुणात्मक बदलाव जरूर है। पहले एक आदमी किसी भी सरकारी बाबू के कमरे में घुसने से डरता था। अब वो स्थिति नहीं। पहले अपना जायज काम कराने के लिए तीन रास्ते थे। पहला रास्ता रिश्वत का, दूसरा रास्ता पैरवी का और तीसरा रास्ता किसी जनसंगठन या जनांदोलन के दबाव का रास्ता था। लेकिन किसी आम आदमी के लिए इन रास्तों की गंुजाइश बेहद कम होती थी। ऐसे लोगों के लिए अब आरटीआइ के रूप में एक चैथा रास्ता खुला है। अगर किसी का कोई जायज काम फंसा है तो वह फौरन आरटीआइ डाल सकता है। आम तौर पर अगर किसी बड़े अधिकारी के फंसने या बड़े स्वार्थ की बाधा नहीं हो तो आरटीआइ के ऐसे आवेदनों से छोटे-मोटे काम आसानी से हो जाते हैं। अधिकारियों में यह भय होता कि इस मामले में उलझने से अच्छा है कि काम करके बाहर निकलो। मलब अगर उसमें बड़ी बाधा न हो तो काम हो जाता है।
इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि पहले जो नौकरशाह पूरी तरह गैर-जवाबदेह थे, उनके अंदर यह एहसास आया है कि वे जनता के प्रति जवाबदेह हैं। उनमें भय है कि किसी भी मामले पर आरटीआइ में पूछा जा सकता है। यह एक बड़ा गुणात्मक परिवर्तन है। जवाबदेही का यह एहसास 1947 की आजादी के समय से ही होना चाहिए था। यह भावना हमारे देश के संविधान में भी मौजूद थी। इसके बावजूद हमारी नौकरशाही का ढांचा अंग्रेजों का बनाया होने के कारण अधिकारियों में आत जनता के प्रति जवाबदेही का एहसास बिलकुल नहीं था। लेकिन अब आरटीआइ ने वह एहसास पैदा कर दिया है और आम जनता के लिए एक खिड़की खुली है।
अब नागरिकों की पहुंच ऐसे अधिकांश दस्तावेजों तक हो गयी है जिन्हें गोपनीय माना जाता था। यहां तक कि आरटीआइ के कारण सरकारी कार्यालयों में दस्तावेज बनाने और रखने की बाध्यता हो गयी है। यूपी के हरदोई जिले में हम वर्ष 2002 से ही सूचना का अभियान चला रहे हैं। वहां हमें कई अधिकारी बताते हैं कि पहले बहुत से दस्तावेज रखने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। विकास योजना का पैसा सीधे पंचायत में चला जाता था। उसका न तो हिसाब रखा जाता था और न ही कोई उसका हिसाब लेता था। यहां तक कि मजदूरों को भुगतान का मस्टररोल भी नहीं बनता था। लेकिन हमारे अभियान के कारण सारे दस्तावेज बनने लगे। मतलब यह कि आरटीआइ आने के बाद सारे दस्तावेज बनने लगे हैं चाहे वे फरजी ही क्यों न हों। अब ऐसे दस्तावेजांे में लाभार्थियों के नाम डालने में भी अधिकारियों को काफी सावधानी बरतनी पड़ती है। उन्हें डर होता है कि फरजी नाम डाले गये तो फंस सकते हैं। यह प्रक्रिया भ्रष्टाचार मिटाने की दिशा में बड़ी पहल है। पहले न्यूनतम मजदूरी 58 रुपये के बजाय महज 30 या 40 रुपये मिलती थी। लेकिन अब मस्टररोल के कारण पूरी मजदूरी मिल रही है। सूचना तकनीक के विकास के कारण भी प्रशासन और नागरिक दोनों को इसका लाभ मिल रहा है।
इस तरह देखें तो आरटीआइ और पारदर्शिता के कारण भ्रष्टाचार पर जबरदस्त असर पड़ा है। भले ही कामनवेल्थ गेम में होने वाले भ्रष्टाचार नहीं रूके हों लेकिन आम आदमी से जुड़े हर छोटे-छोटे काम मंे भ्रष्टाचार में कमी आ रही है। अगर राशि के लिहाज से भ्रष्टाचार की बात करें तो पहले से ज्यादा विकास राशि आने के कारण भ्रष्टाचार भी ज्यादा राशि का होता हुआ दिखेगा। लेकिन अब पहले जैसा मनमाना भ्रष्टाचार नहीं रहा। जनता से सीधे जुड़ी योजनाओं में हम इसका भरपूर उपयोग करके भ्रष्टाचार पर जबरदस्त अंकुश लगा सकते हैं। जैसे जन वितरण प्रणाली या नरेगा के काम। जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करने में आरटीआइ ने बड़ी भूमिका निभायी है और आम जनता का सशक्तिकरण हुआ है।
हरदोई जिले में वर्ष 2006 तक बीपीएल श्रेणी के लोगों को राशन का एक दाना तक नहीं मिलता था। आरटीआइ में हमने राशन वितरण के रजिस्टर, राशन कार्ड धारियों की सूची वगैरह निकाल ली। सतरह दिनों तक हरदोई में धरना भी चला। इसके बाद बीपीएल का राशन बंटना शुरू हुआ और अब हर गांव में पहुंच रहा है, भले ही उसकी मात्रा कम दी जा रही हो, दाम ज्यादा लिया जा रहा हो।
आरटीआइ आंदोलन में सबसे बड़ी बाधा सूचना आयोग है। प्रारंभ में कुछ सूचना आयोगों की बेहतर भूमिका थी। लेकिन जल्द ही उन्हें समझ में आ गया कि उन्हें इस व्यवस्था के पक्ष में खड़ा होना है। जिस तरह न्यायपालिका ने भी यह समझ लिया है कि प्रकारांतर से उसे इस व्यवस्था का ही साथ देना है। यही कारण है कि जजों ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा देने से इंकार कर दिया और सूचना आयोग पर इस पर कठोरता से परहेज कर रहा है।
-डा विष्णु राजगढ़िया के साथ बातचीत पर आधारित
Tuesday, September 28, 2010
RTI has proved its relevance : Nandini
FIVE YEARS of RTI : An Interview with Ms. Nandini Sahai, Director, ICG, Goa
Question - Does RTI proved its relevance and effectiveness in five year? How?
Nandini - Yes RTI has proved its relevance. The bureaucracy is now living in fear and is tightening up and becoming more honest. It knows that public is getting aware about their rights and is running out of patience to bear corruption any more. Ordinary people now refuse to cower down before the system and RTI is now the weapon of people to fight injustice.
Question - Some major examples, which you think the big icon or success of RTI.
Nandini -There are many success stories of RTI but a major breakthrough and a milestone for RTI would have been if there were applications filed for the Common Wealth Games. I feel sad that the civil society has let corruption happen during this prestigious game preparation. They have allowed the organizing committee to siphon out money. This is the saddest defeat that has happened in the history of RTI.
Question - How is common man empowered with RTI? Any one or two examples you think most quotable.
Nandini - Common man is empowered by RTI and is using it to know how the government he voted for is performing. For e.g One such person is 30-year-old daily wage labourer Sadashiv from Banda district of Uttar Pradesh who secured grocery entitlement due to him on his ration card not only for himself but his fellow villagers after using the RTI tool to question the system. In the initial days after he submitted the application, the proprietor of the local ration shop sent hired toughs who beat him mercilessly, but his attempt to stand up against corruption paid off.
Ashish Sinha, another labourer, filed an RTI about the number of days the local ration shop should be open. Infact the shops were open only once a week, when they are supposed to keep them open for five and a half days in a week. Armed with the RTI reply, Sinha hauled up to the nearest dealer and then eight dealers were questioned. The shops are now open four days in a week and the dealers have put up boards indicating the stocks and prices. In metropolitan area, the awareness level is still better and the condition of the government departments is still better. But examples of poor and uneducated villagers using RTI Act are commendable.
Question - Has RTI affected the state of governance and created any atmosphere of Transparency and Accountability, as well as has it controlled the corruption? How?
Nandini - Yes but to only a certain extent. Well this is just the beginning. Five years of RTI is a small time as compared to 60 years of secrecy in Indian Bureaucracy. I am optimistic as slowly the public is getting aware and are extensively using RTI to fight corruption without fear.
Question - What are the major challenges and complications in proper implementation of RTI?
Nandini - I would lile to point out the following
1. Awareness is needed which is still lacking in many parts of India.
2. Media has an important role to play in spreading awareness like for e.g a dedicated newspaper column or 10 mins regular TV program on RTI should be started in local language.
3. There was a blanket of secrecy for 60 years, from which the people are still to recover, especially the bureaucracy.. The civil society has to continue its struggle for the proper implementation of the RTI Act.
4. Poor record keeping and low levels of literacy and awareness of rights among the general masses are responsible reasons for continuation of regime of secrecy and unwieldy increase in corruption.
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