Saturday, September 25, 2010

Pls sign this online petition To: The Chief Information Commissioners and Information Commissioners of Central and State Information Commissions Subject - Coming close to the people by avoiding RED LIGHT on your car Sir, All the citizen of India would be celebrating the Fifth anniversary of the RTI Act on 12th of October 2010. This occasion would be remembered as a significant step towards strengthening the common man’s access to the fundamental rights given by the Constitution of India. This particular day would hold the honour of being the occasion for empowerment of the common man to enjoy more democratic space and rights. But on the contrary, this day would also make us realize the fact that some of the Information Commissions or Commissioners have not stood up to the expectation of general public. In fact some of them have disappointed the real essence of the RTI Act. Some of them have been accused of being unconstitutionally liberal to the government officers and total ignorance of the provisions of RTI Act has also been reported at some places. Moreover there are certain Commissions who have denied disclosing their decisions. This in turn is a major setback in the direction of building an environment of Transparency and Accountability where a common man is empowered and entitled to avail all the desired information. It can be quoted that when the sailor intends to sink the ship, which will save the crew!!! It�s high time now when the role and responsibilities of Information Commissioners should be seriously discussed. The RTI activists from all the corners of the country are raising their voices in this concern. Thus, it is now the turn of Information Commissioners to realize their responsibilities and take some effective and impressive action as to safeguard the intentions and benefits of this Act. We all hope that there are some Information Commissioners at states and central level, who do not consider this designation merely as an authority for money, power and honour but they are aware that their designation holds a duty towards the democracy and the citizens. All such Chief Information Commissioners and Information Commissioners are requested to take a pledge on 5th anniversary of the RTI act: 1. To stop using the Red Lights on Cars as this is a symbol of discrimination with the citizen. 2. To stop taking body guards. 3. To disclose own assets so that the accountability parameters may be strengthened. We hope that you would join hands for the campaign of making the Information Commission as the most prestigious organization responsible for proper implementation of the various provisions of the RTI Act and making it more public oriented and accountable so that this Act may prevail and better known as People’s Act and the Information Commissions may eagerly work/enact in the general interest of public. -Dr. Vishnu Rajgadia (Secretary, Jharkhand RTI Forum ) IN HINDI केंद्रीय एवं राज्य मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों से एक निवेदन वाहन पर लाल बत्ती का उपयोग बंद करें और नागरिकों के करीब आएं मान्यवर 12 अक्तूबर 2010 को भारत के नागरिक सूचना का अधिकार कानून की पांचवीं वर्षगांठ मनाएंगे। यह अवसर भारतीय नागरिकों को संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों की प्राप्ति की दिशा में अधिकाधिक समर्थ बनाने के ऐतिहासिक दिवस के बतौर याद किया जायेगा। यह दिन आम आदमी को अधिकाधिक लोकतांत्रिक अधिकारों से लैस करने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाने का गौरवपूर्ण अवसर होगा। लेकिन यही दिन इस कसक का भी होगा कि देश और राज्यों के कतिपय सूचना आयोग या सूचना आयुक्त विगत पांच वर्षों में नागरिकों की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे हैं। यहां तक कि कुछ सूचना आयोगों या सूचना आयुक्तों से गंभीर निराशा भी हाथ लगी है। कहीं अधिकारियों के प्रति अत्यधिक नम्र रवैया अपनाते हुए सूचना कानून के प्रावधानों का खुला उल्लघन जारी रखने की शिकायत आती है तो कहीं अनियमितता के गंभीर आरोप सामने आते है। हद यह कि इस देश में ऐसे भी सूचना आयोग हैं जो अपने फैसलों को सावर्जनिक नहीं करने पर अड़े हैं। इसके कारण सूचना कानून के सहारे भारतीय नागरिकों को संबल प्रदान करने और पारदर्शिता व जवाबदेही का परिवेश निर्मित करने के महान उद्देश्य को गहरे नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। कहा जा रहा है कि जब नाविक ही नाव को डुबोयेगा तो उसे कौन बचा सकता है। अतः समय आ गया है जब सूचना आयोगों की भूमिका पर गंभीर चर्चा हो और एक कारगर रास्ता निकले। देश भर के सूचनाधिकार कार्यकत्र्ता विभिन्न रूपों में इस पर सवाल कर रहे हैं। लिहाजा, स्वयं सूचना आयुक्तों का कर्तव्य बनता है कि इस दिशा में कारगर पहल हो। हमें उम्मीद है कि देश और राज्यांे में ऐसे मुख्य सूचना आयुक्तों, सूचना आयुक्तों की कमी नहीं जो इस पद को महज पैसे, पावर और प्रतिष्ठा की नौकरी नहीं बल्कि इस लोकतंत्र और इसके नागरिक के प्रति एक दायित्व के बतौर देखते होंगे। ऐसे सभी मुख्य सूचना आयुक्तों/सूचना आयुक्तांे से निवेदन है कि वह 12 अक्तूबर 2010 को सूचना कानून की पांचवीं वर्षगांठ पर निम्नांकित बिंदुओं की स्वयंघोषणा करें- 1. आप स्वेच्छा से अपने वाहनों पर लाल बत्ती का उपयोग करना बंद करें क्योंकि ऐसे प्रतीक चिह्न हमें नागरिक से श्रेष्ठ नस्ल का कोई जीव होने का बोध कराते हैं। 2. आप स्वेच्छा से अपने साथ अंगरक्षक रखना बंद कर दंे। 3. आप स्वेच्छा से अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा करें। आशा है, सूचना का अधिकार के प्रावधानों एवं इसकी भावना के समुचित अनुपालन की दिशा में सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्था सूचना आयोग को वास्तविक गरिमा प्रदान करने और इस जनोन्मुखी बनाते हुए नागरिकों के प्रति अपने दायित्य का एहसास करने की दिशा में आप ठोस कदम उठायेंगे। ONLINE PETITION

Friday, August 20, 2010

क्या संसद से भी ऊपर है आरटीआई?

विष्णु राजगढ़िया सूचना कानून ने हर नागरिक को सांसद और विधायक से ज्‍यादा ताकत दी है : जिन सवालों के उत्‍तर विधानसभा में विधायकों को नहीं मिलते उसे आम नागरिक आरटीआई से पा लेता है : लोकसभा के मौजूदा सत्र में दस अगस्त को दिलचस्प वाकया हुआ। खेल मंत्री एमएस गिल कॉमनवेल्थ गेम्स में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से जूझ रहे थे। इसी दौरान उन्होंने कह डाला कि सांसद चाहें तो सूचना कानून के सहारे ऐसे मामलों के दस्तावेज हासिल कर सकते हैं। इस जवाब ने मानो आग में घी का काम किया। विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने नाराज होकर पूछ डाला- ‘क्या संसद से भी ऊपर है आरटीआई? 'लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था' में उपस्थित जनप्रतिनिधियों को किसी भी मामूली भारतीय की तरह सूचना मांगने की सलाह पर ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। लिहाजा कोई सांसद इस सलाह पर शायद ही अमल करे। लेकिन अनुभव बताते हैं कि सूचना कानून के सहारे कोई भी सामान्य नागरिक कॉमनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार से जुड़ी ऐसी महत्वपूर्ण जानकारियां आसानी से निकाल सकता है। ऐसी जानकारियां किसी सांसद या विधायक को संसद या विधानसभा में मिलना काफी मुश्किल और शायद असंभव है। आखिर मामला क्या है? सूचना कानून में साफ लिख दिया गया है कि जिस सूचना के लिए संसद या विधानसभा को इनकार नहीं किया जा सकता, उसके लिए किसी नागरिक को भी इनकार नहीं किया जायेगा। स्पष्ट है कि आज कोई भी नागरिक हर वैसी सूचना मांग सकता है जो किसी सांसद या विधायक को मिल सकती है। दूसरी ओर, अब तक ऐसा कोई प्रावधान नहीं बना है कि संसद या विधानसभा में हर ऐसी सूचना मिल सकती है, जो सूचना कानून के जरिये आम नागरिक को प्राप्त है। इसके कारण आज आम नागरिक हमारे जनप्रतिनिधियों की अपेक्षा ज्यादा धारदार तरीके से शासन-प्रशासन को कठघरे में खड़ा करने योग्य दस्तावेजी सबूत हासिल कर रहे हैं। संसद और विधानसभाओं में सवाल पूछने और जवाब देने के तरीके को देखें तो सूचना कानून से इसका फर्क पता चलता है। आम तौर पर लिखित प्रश्नों में जनप्रतिनिधि को अपनी ओर से कोई विशिष्ट सूचना पेश करते हुए यह पूछना होता है कि यह सच है अथवा नहीं। इसके लिए जनप्रतिनिधि के पास ठोस प्रारंभिक सूचना होना जरूरी होता है। क्या यह सच है, अगर हां तो क्यों शैली में पूछे गये इन प्रश्नों में अगर आपके पास पहले से पर्याप्त सूचना नहीं तो जवाब भी ठन-ठन गोपाल होने की पूरी गुंजाइश रहती है। इसी तरह, सदन में आये प्रश्नों के जवाबों की भी खास प्रकृति होती है। नौकरशाहों द्वारा तैयार जवाबों के आधार पर सदन में मंत्री अपना पक्ष रखता है। इसमें सवाल उठाने वाले जनप्रतिनिधि को सारे संबंधित दस्तावेज नहीं दिये जाते बल्कि उस पर सरकार का पक्ष रखा जाता है। इसमें सवाल उठाने वाले को दस्तावेजों के अध्ययन के आधार पर जवाबतलब करने का समुचित अवसर प्रायः नहीं मिल पाता। दूसरी ओर, सूचना कानून ने प्रश्नोत्तर की इन सीमाओं से आगे जाकर संबंधित मामले के सारे दस्तावेज हासिल करने की जबरदस्त ताकत दी है। इसमें कोई सवाल उठाने के लिए नागरिक के पास अपनी प्रारंभिक एवं ठोस सूचना की जरूरत नहीं। वह एक साधारण पंक्ति लिखकर कॉमनवेल्थ खेलों की पूरी फाइल मांग सकता है। इस तरह फाइल लेने का कोई सामान्य प्रावधान संसद या विधानसभा में नहीं है। तब क्या यह कहना अतिश्योक्ति है कि सूचना कानून ने आज हर नागरिक को सांसद और विधायक से भी ज्यादा ताकत दी है? संसद और विधानसभा के सत्रों को देखें तो यह बात और स्पष्ट हो सकेगी। जनता ने अपने जनप्रतिनिधि चुनकर भेजे। उन्हें नागरिकों की ओर से सवाल पूछने का दायित्व सौंपा गया। लेकिन साल में महज बीस से पचास दिन चलने वाले सदन की प्रक्रिया प्रायः विचारहीन शोरशराबे या औपचारिकताओं में डूबी रहती है। प्रश्नोत्तर काल का ज्यादातर समय हंगामे की भेंट चढ़ जाता है। महालेखाकर की रपटों, बजटों, योजनाओं, कानूनी संशोधनों या विधेयकों को कई बार पढ़ा तक नहीं जाता, बहस तो दूर की बात। जनप्रतिनिधियों के लिए सवाल पूछने की गुंजाइश अत्यंत सीमित रह जाती है। कुछ सवाल पूछे भी गये तो जवाब नदारद। जवाब मिला भी तो कार्रवाई खुदा जाने। कोई विधायक-सांसद सवाल पूछना चाहे तो कोई जरूरी नहीं कि वह स्वीकृत हो जाये। हुआ भी तो जरूरी नहीं कि सदन में उस पर चर्चा हो। हुई भी तो जरूरी नहीं कि जवाब मिले। एक बार मामला खत्म, तो फिर अगले सत्र का इंतजार। एक दिन में कोई सांसद या विधायक कितने सवाल पूछ सकेगा, इसकी भी सीमा है। उन्हें यह कहकर टाला जा सकता है कि विभाग से सूचना की प्रतीक्षा की जा रही है। ऐसे हजारों उदाहरण पेश किये जा सकते हैं जिनमें सांसद, विधायक के सवालों का जवाब बरसों तक नहीं मिला। इस तरह, सदन में पूर्ण विफल जनप्रतिनिधि अपने कीमती समय का बड़ा हिस्सा समितियों की बैठकों और टूर-दौरों में, उद्घाटन और अभिनंदनों में, विवाह और शोक समारोहों की शोभा बनने में गंवा देता है। इससे भी कुछ समय निकला तो दलीय गुटबंदी। दूसरी ओर, सूचना कानून में एक माह की समय सीमा लागू है। नागरिकों के सवालों को स्थगित नहीं किया जा सकता। जवाब देना होता है। नहीं दिया तो सूचना आयोग दिला देगा। सूचना मांगने का कोई मौसम नहीं। यही कारण है कि आज कोई सवाल उठाने, जवाब मांगने के लिए नागरिक किसी जनप्रतिनिधि का मोहताज नहीं। वह हर चीज का हिसाब खुद मांगने, जांच करने को स्वतंत्र है। साठ साल में संसद और विधानसभा में जितने सवाल पूछे गये, उससे ज्यादा सूचना पांच साल में नागरिकों ने खुद ही हासिल कर ली है। मजेदार बात यह है कि आज ऐसे सांसदों, विधायकों, पूर्व मंत्रियों की बड़ी संख्या है जो सूचना कानून का शानदार उपयोग कर रहे हैं। पूर्व सांसद रमेंद्र कुमार का स्पष्ट मानना है कि एक नागरिक के बतौर उन्हें यह कानून ज्यादा ताकत देता है। विधायक विनोद सिंह के अनुसार जो सूचना एक विधायक के बतौर उन्हें झारखंड विधानसभा में नहीं मिल सकी, वही सूचना उन्होंने एक नागरिक के तौर पर सूचना कानून के जरिए आसानी से हासिल कर ली। एक आईपीएस के खिलाफ तत्कालीन एडीजीपी वीडी राम की जांच रिपोर्ट का मामला काफी चर्चित है। माले के चर्चित विधायक महेंद्र सिंह द्वारा लगाये गये गंभीर आरोपों के बाद यह जांच गठित हुई थी। लेकिन स्पीकर के आदेश के बावजूद विधानसभा में यह रिपोर्ट पेश नहीं की गयी। जिस विधानसभा के कारण वह जांच हुई, उसी विधानसभा को रिपोर्ट नहीं मिली। महेंद्र सिंह ने इसे बार-बार सदन में उठाया। उनकी हत्या के बाद उनके पुत्र विधायक विनोद सिंह ने भी सदन में रिपोर्ट पेश करने की मांग की। लेकिन विधानसभा को रिपोर्ट नहीं मिली। इसी बीच विनोद सिंह ने एक नागरिक के बतौर सूचना कानून के सहारे वही रिपोर्ट आसानी से हासिल कर ली। एक और दिलचस्प उदाहरण। वर्ष 2006 में झारखड विधानसभा में तेजतर्रार विधायक बंधु तिर्की ने विकास योजना की अरबों की राशि बैंकों में जमा रखने पर सवाल पूछे। सदन में जवाब मिला कि सूचना एकत्र की जा रही है। छह महीने बाद फिर यही जवाब। विधायक को कोई सूचना नहीं मिली। यह देखकर इन पंक्तियों के लेखक ने आरटीआई आवेदन देकर सरकार से यही सूचना मांग डाली। देखते-ही-देखते हजारों पृष्ठों की सूचना मिल गयी। किसी भी विषय पर सवाल उठाने के लिए संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों का अध्ययन आवश्यक है। सूचना कानून ने हर नागरिक को यह ताकत दी है। संसद और विधानसभा के प्रश्नोत्तर की प्रकृति भिन्न है। जनप्रतिनिधियों को अगर आधिकारिक दस्तावेजों का पूर्व अध्ययन करने का अवसर मिले तो उनके द्वारा उठाये गये सवाल ज्यादा धारदार हो सकते हैं। इसलिए समय आ गया है, जब सदन में सवालों और उन पर सरकार के जवाब को ज्यादा सार्थक और परिणामदायक बनाने के लिए सांसदों और विधायकों को संबंधित दस्तावेज कुछ दिनों पहले हासिल करने का अवसर मिले। अभी उन्हें सदन में या एक दिन पहले सिर्फ बेहद सीमित जवाब पकड़ा दिये जाते हैं। उन पर पूरक प्रश्नों के जरिये बहुत कुछ निकालना कई बार संभव नहीं हो पाता। इसलिए आज सवाल यह नहीं है कि संसद से भी ऊपर आरटीआई है अथवा नहीं। सवाल सिर्फ इतना है कि इस कानून ने पारदर्शिता और जवाबदेही के जो नये आयाम खोले हैं, उनका सदुपयोग हमारे जनप्रतिनिधि किस प्रकार से करना चाहते हैं। अगर कोई जनप्रतिनिधि सदन के लिए अपने सवाल बनाने में आरटीआई का उपयोग करे तो आसानी से समझ लेगा कि ‘‘क्या संसद से भी ऊपर है आरटीआई?‘‘ ---------------- नई दुनिया, 16-08-2010 को प्रकाशित

Saturday, December 19, 2009

रणेन्द्र का उपन्यास- ग्लोबल गांव के देवता -------------------- विष्णु राजगढ़िया सिंगूर, लालगढ़, सलवा जुड़ुम और आपरेशन ग्रीन हंट के इस दौर में कवि, विचारक एवं कथाकार रणेन्द्र का उपन्यास आया है- ग्लोबल गांव के देवता । यह सामयिक जटिलताओं और वर्तमान चुनौतियों व बहसों की साहित्यिक प्रस्तुति भर नहीं है। इसमें मानव समाज की उत्पत्ति से विकासक्रम में बेहतरी की अदम्य तलाश एवं निरंतर कठिन श्रम के जरिये विशिष्ट एवं युगांतकारी योगदान करने वाले समुदायों एवं खासकर जनजातियों को कालांतर में निरंतर हाशिये पर धकेल दिये जाने की ऐतिहासिक समझ भी मिलती है। इस रूप में देखें तो इसमें अतीत की पृष्ठभूमि को आधार बनाकर वर्तमान की चुनौतियों को समझने की कोशिश की गयी है। साथ ही यह पूंजी की पोषक सत्ता द्वारा जनजातियों को निरंतर वंचित करने के षड़यंत्रों को ग्लोबल फलक से उठाकर गांव के स्तर तक लाते हैं। इस तरह यह अतीत के साथ वर्तमान और ग्लोबल के साथ लोकल के सहज सामंजन का खूबसूरत उदाहरण है। रणेन्द्र का यह उपन्यास आधुनिक भारत में जनजातियों के लिए उत्पन्न अस्तित्व-मात्र के संकट के साथ ही जनप्रतिरोध की विविध धाराओं के उदय एवं उनकी जटिलताओं की सांकेतिक रूपों में महत्वपूर्ण प्रस्तुति करता है। ग्लोबल देवताओं को खनिज की भूख है और उनकी भूख मिटाने के लिए जनजातियों को जमीन से बेदखल करना जरूरी है। भारत सरकार को भी जनजातियों से ज्यादा जरूरी भेड़िये को बचाना है। आदिवासियों के विस्थापन और इसके खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध से लेकर हिंसक प्रतिरोध तक की स्थितियों को सामने लाने के लिए रणेन्द्र ने असुर जनजाति को केंद्र में रखा है। आग और धातु की खोज करने वाली] धातु को पिघलाकर उसे आकार देने वाली कारीगर असुर जाति को मानव सभ्यता के विकासक्रम में हाशिये पर धकेल दिये जाने और अब अंततः पूरी तरह विस्थापित करके अस्तित्व ही मिटा डालने की साजिश इस उपन्यास में सामने आती है। उपन्यासकार बाहर से गये एक संवेदनशील युवा उत्साही स्कूली शिक्षक के बतौर इस जनजाति के सुख-दुख और जीवन-संघर्षों में खुद को स्वाभाविक तौर पर हर पल शामिल पाता है। इस दौरान वह असुर जनजाति के संबंध में कई मिथकों एवं गलत धारणाओं की असलियत को समझता है, वहीं ऐतिहासिक कालक्रम में इस जनजाति के खिलाफ साजिशों की ऐतिहासिक समझ भी हासिल करता है। दरअसल यही समझ उसे इन संघर्षों में शरीक होने की प्रेरणा देता है। उसे लालचन असुर के रूप में खूब गोरा-चिट्टा आदमी मिलता है जबकि उसकी धारणा में असुर लोग खूब लंबे-चैड़े, काले-कलूटे भयानक लोग थे। छरहरी-सलोनी पियुन एतवारी भी असुर है, यह जानकर भी युवा शिक्षक चकित है। जल्द ही असुर लोगों के ज्ञान व समझ को लेकर गलत धारणाएं भी मिट जाती हैं। समुदाय के सुख-दुख में भागीदार उपन्यासकार जहां धीरे-धीरे असुर जनजाति के खिलाफ सदियों से चली आ रही साजिशों को समझता जाता है, वहीं इलाके में बाक्साइड के रूप में मौजूद कीमती खनिज की लूटखसोट के लिए देशी-विदेशी पूंजी के हथकंडों और हमलों के खिलाफ लड़ाई का हिस्सा बनता है। अहिंसक, शांतिपूर्ण याचनाएं अनसुनी कर दी जाती है और शिवदास बाबा का कराया समझौता लागू होने के बजाय आंदोलन को बिखरने का षड़यंत्र ही साबित होता है। असुरों को उजाड़ने की साजिश के खिलाफ रुमझुम असुर का प्रधानमंत्री के नाम पत्र लिखता है- भेड़िया अभयारण्य से कीमती भेड़िये जरूर बच जायेंगे श्रीमान्, किंतु हमारी असुर जाति नष्ट हो जायेगी....। लेकिन ऐसे पत्र आंदोलनकारियों पर पुलिस हमले नहीं रोक पाते और छह मृतकों को पुलिस मुठभेड़ में मारे गये नक्सली की संज्ञा मिलती है। बिना पुनर्वास और बिना मुआवजे के 37 गांवों में सदियों से रहने वाले हजारो परिवार आखिर कहां जायें] इसका जवाब किसी के पास नहीं। उल्टे, ऐसे सवाल उठाने वालों के लहू से धरती लाल हो जाती है और यूनिवर्सिटी हास्टल से सुनील असुर के रूप में एक नयी शक्ति सामने आती है। आंदोलन की विविध धाराओं की जटिलताओं और सवालों को सामने लाकर उपन्यास ढेर सारे सवाल छोड़ जाता है। उपन्यासकार के सामने निश्चय ही यह चुनौती रही होगी कि पाठकों को असुर जनजाति के विकासक्रम की जटिलताओं के संबंध में प्रामाणिक तथ्यों की प्रस्तुति करके हुए मानवशाष्त्रीय एवं ऐतिहासिक पहलुओं का विवरण कहीं इसे बोझिल नहीं बना दे। इसके साथ ही, विभिन्न रीति-रिवाजों एवं अंधविश्वासों का विवरण भी उपन्यास को जनजातीय समाजशास्त्र की पुस्तक में बदल सकता था। ऐसे खतरे उठाते हुए रणेन्द्र ने कथ्य और शिल्प दोनों स्तर पर संतुलन बनाते हुए उपन्यास को रोचक बनाये रखा। ऐसे एक व्यापक फलक को लेकर चलते हुए उपन्यासकार ने ललिता जैसी पात्र के भावुक प्रसंगों के लिए भी गुंजाइश निकालकर अपनी लेखन क्षमता एवं कल्पनाशीलता का परिचय दिया है। इस उपन्यास के लिए भाई रणेन्द्र को बधाई। आप भी उन्हें 094313-91171 नंबर पर बधाई दे सकते हैं। ----------------- उपन्यास-परिचय रणेन्द्र ग्लोबल गांव के देवता भारतीय ज्ञानपीठ पृष्ठ- 100 वर्ष- 2009 ----------------------------------

Sunday, November 22, 2009

आनलाइन हस्ताक्षर करके विरोध जतायें विष्णु राजगढ़िया बिहार में सूचना मांगने वालों को प्रताड़ित करने की काफी शिकायतें आ रही हैं। अब बिहार सरकार ने सूचना पाने के नियमों में अवैध संशोधन करके एक आवेदन पर महज एक सूचना देने का नियम बनाया है। अब गरीबी रेखा के नीचे के लोगों को सिर्फ दस पेज की सूचना निशुल्क मिलेगी, इससे अधिक पेज के लिए राशि जमा करनी होगी। ऐसे नियम पूरे देश के किसी राज्य में नहीं हैं। ऐसे नियम सूचना कानून विरोधी हैं। इससे सूचना मांगने वाले नागरिक हताश होंगे। इससे नौकरशाही की मनमानी बढ़ेगी। इस तरह बिहार सरकार ने सूचना कानून के खिलाफ गहरी साजिश की है। अगर सूचना पाने के नियमों में संशोधन हुआ तो नागरिकों को सूचना पाने के इस महत्वपूर्ण अधिकार से वंचित होना पड़ेगा। एक समय बिहार को आंदोलन का प्रतीक माना जाता था। आज सूचना कानून के मामले में बिहार पूरे देश में सबसे लाचार और बेबस राज्य नजर आ रहा है। वहां सुशासन की बात करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दुशासन की भूमिका निभाते हुए कुशासन को बढ़ाना देने के लिए सूचना कानून को कमजोर किया है। इसलिए आनलाइन पिटिशन पर हस्ताक्षर करके अपना विरोध अवश्य दर्ज करायें। इसके लिए यहां क्लिक करें- संशोधन के संबंध में विस्तृत जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें http://mohallalive.com/2009/11/19/nitish-government-changed-right-to-information-act/

Thursday, November 19, 2009

सूचना के अधिकार पर अत्याचार? मणिकांत ठाकुर बीबीसी संवाददाता, पटना सूचना का अधिकार अधिनियम 2005. बिहार में इस क़ानून के तहत सूचना मांगने वाले लोगों पर भ्रष्ट अधिकारियों के अत्याचार का डंडा बरसने लगा है. यहाँ पंचायत स्तर से लेकर सरकारी विभागों के स्तर तक इस मामले में प्रताड़ना के कई मामले सामने आ चुके हैं. सरकारी योजनाओं में बरती गई अनियमितताओं को दबाने-छिपाने वाला अधिकारी या कर्मचारी वर्ग यहाँ लोगों के सूचना-अधिकार के ख़िलाफ़ हमलावर रुख़ अपना चुका है. बिहार में तीन साल पहले इस अधिनियम को लागू करते समय दिखने वाली सरकारी तत्परता की देश भर में सराहना हुई थी. आज स्थिति उलट गई लगती है. कारण है कि अब इसी राज्य में नागरिकों के सूचना-अधिकार का हनन सबसे ज़्यादा हो रहा है. दूसरी ओर शिकायतों की भरमार से घबराए मुख्यमंत्री ने कुछ फौरी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं. इसी सिलसिले में उन्होंने एक हेल्पलाइन नंबर- 2219435 जारी करते हुए ख़ुद टेलिफ़ोन पर पहली शिकायत (संख्या 001) दर्ज कराई. टेलिफ़ोन पर मुख्यमंत्री ने लिखाया- मुख्यमंत्री सचिवालय को सूचना मिली है कि वीरेंद्र महतो, ग्राम- कसियोना, पंचायत- करैया पूर्वी, प्रखंड- राजनगर, ज़िला- मधुबनी द्वारा करैया के प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी से जन वितरण प्रणाली की दुकानों में राशन- किरासन आपूर्ति का ब्यौरा माँगा गया था. इस पर उनको धमकी दी गई, जो राजनगर पुलिस थाना में केस संख्या 181/09 दिनांक 10-08-09 दर्ज किया गया है. इस मामले की पूरी जांच करके मुख्यमंत्री सचिवालय को सूचना दी जाए. समझा जा सकता है कि मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर एक नरम किस्म की ही शिकायत दर्ज कराई. गंभीर किस्म की शिकायतें तो आम लोगों के बीच जाने पर मिलती हैं. कहीं मुखिया और पंचायत सेवक, तो कहीं प्रखंड, अनुमंडल और ज़िला स्तरीय पदाधिकारी सरकारी योजना राशि में लूट मचाते हुए मिलते हैं. लेकिन इन्हें पकड़ेगा कौन? सब जानते हैं कि नीचे से ऊपर तक का सरकारी महकमा लूट में शामिल रहता है. ऐसे में सूचना के अधिकार के तहत कोई आम आदमी अगर घोटाले का राज़ खोलने वाली जानकारी मांगेगा तो लुटेरों के बीच खलबली होगी ही. राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त अशोक कुमार चौधरी फिर भी नहीं मानते कि कोई लोक सूचना पदाधिकारी किसी सूचना माँगने वाले को जेल भेजने की धमकी देता होगा या किसी सरकारी फ़ाइल को ग़ायब करता होगा. लेकिन उन्होंने कुछ शिकायतों को स्वीकार करते हुए कहा, "इस क़ानून के प्रावधानों की सही समझ अभी पूरी तरह न तो लोक सेवकों में है और न ही सूचना मांगनेवाले लोगों में. सबकुछ दुरुस्त होने में कुछ वक़्त लगेगा. जहाँ तक प्रताड़ना कि बात है तो ऐसी निश्चित और सही शिकायत अगर आयोग को मिलेगी तो उसे कार्रवाई के लिए सरकार के पास ज़रूर भेजा जाएगा." सूचना अधिकार मामलों से जुड़ी एक गैर सरकारी संस्था की प्रमुख परवीन अमानुल्लाह का कहना है कि भ्रष्ट सरकारी अफ़सरों और कर्मचारियों का ऐसा गिरोह बन गया है, जो इस क़ानून को बेअसर बनाने पर तुला हुआ है. परवीन कहती हैं, "अगर कोई आम आदमी सूचना पाने के अपने हक़ का डटकर इस्तेमाल करना चाहता है तो उसे डरा-धमका कर ख़ामोश करानेवाले सरकारी अधिकारी फ़ौरन सक्रिय हो जाते हैं. इसलिए दोषी पाए जाने पर भी उन पर सख़्त कार्रवाई नहीं होती. मैंने 45 ऐसे मामलों की जानकारी राज्य सरकार को बहुत पहले दी थी, लेकिन उस पर अब तक कुछ भी नहीं हुआ." यहाँ उल्लेखनीय है कि परवीन अमानुल्लाह बिहार के एक बड़े आईएएस अधिकारी अफज़ल अमानुल्लाह की पत्नी हैं. इन्होंने एक भेटवार्ता में बीबीसी से खुलकर कहा कि राज्य की शासन व्यवस्था में भारी गड़बड़ी है और यहाँ अधिकांश नौकरशाह भ्रष्ट हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने भाषणों में ज़रूर कहते हैं कि लोकतंत्र में जनता ही मालिक है और मालिक की मांगी गई सूचना नहीं देने वाले नौकर यानी अधिकारी बख्शे नहीं जाएँगे. लेकिन होता है उल्टा. प्रताड़ित जनता हो रही है और नेता-अधिकारी फल-फूल रहे हैं. http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2009/11/091121_bihar_rti_pp.shtml?s

Monday, November 16, 2009

SAVE RTI CAMPAIGN Please Sign Two Online Petitions to Save RTI
  • Petition for Transparent Selection of CIC
http://www.petitiononline.com/aishu/petition.html
  • Petition against Amendment in RTI Act
http://www.petitiononline.com/urvashi/petition.html

Wednesday, October 21, 2009

A milestone : Nandini Sahai in seminar on RTI July 2, 2006, Hotel Capitol Hill, Ranchi
on dias- Mr. AA Khan, VC, Ranchi University, Mr. T. Nandkumar, Senior IAS, Mr. Raghuvar Das, Minister for Finance and Urban Development, Mr. Mukhtiyar Singh, Senior IAS
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The Seminar was organised by Vishnu Rajgadia, on behalf of Prabhat Khabar

Congratulations

Nandini Sahai joins as Director & Chief Executive of The International Centre, Goa Nandini Sahai joined as the Director & Chief Executive of The International Centre, Goa (ICG) last week. She is the fourth, as well as the first woman Director of the International Centre, Goa. Her vision is to make ICG into a completely holistic place of international standards, where ideational as well as other activities take place in a world class ambience. Nandini Sahai has been a distinguished development journalist with more than 30 years of experience having started her career with the Press Institute of India. For her, journalism was not a profession but a passion and a powerful tool for social development. She founded MICCI (Media Information and Communication Centre of India) with the support of some like-minded academicians, bureaucrats, media and communication experts, and was also the Country Manager of AMIC-India, a subsidiary of AMIC (Asian Media and Information Centre), a Singapore-based International NGO working in media related issues. She is one of the leading Right to Information (RTI) advocates having organized a number of public hearings, seminars and workshops for the RTI movement in India & Sri Lanka and has also worked closely with Magsaysay Award winner Aruna Roy. She was also the member of the Select Committee in formulating the RTI Act for the Delhi Government. Her two advocacy workshops, one on 'Contempt of Court' where Truth was made as defence and another on the 'Broadcasting Bill' where the Government stalled the Bill and formed the NBA (National Broadcasting Association) to formulate the Content Code, have been path breaking. She has also worked closely on a number of issues relating to Media, Social Development, Disaster Management, Rural Journalism and the Judiciary, with international organisations such as UNESCO, Friedrich Ebert Stiftung (FES) - India, (AIBD) (Asia-Pacific Institute for Broadcasting Development, Malaysia), the International Rehabilitation Council for Torture Victims (IRCT) on issues of Torture and Human Rights. She has organised several seminars with senior media persons from India and South Asia on issues of media and public interest in South Asia. She is widely travelled and has also addressed a seminar in Stanford University, USA, on the benefits of Community Radio. Her family consists of her two children who are working in Delhi. In her free time she likes to read and listen to music. Thanks and regards, Arjun Halarnkar
Programme Manager
The International Centre, Goa
Goa University Road, Dona Paula, Goa 403004
INDIA Tel: +91 832 2452805-10 Fax: +91 832 2452812
Cell: +91 9765404391 http://www.goadialogues.com/

Tuesday, October 6, 2009

INVITATION

You are cordially invited to attend Regional Seminar on Converting Electoral Democracy into Participatory Democracy: Role of RTI Organised by Media Information and Communication Centre of India (MICCI), Friedrich Ebert Stiftung (FES) and Jharkhand RTI Forum 10-12 October 2009, at 9.30 am, Hotel Chinar, Main Road, Ranchi 50 Citizens of Jharkhand will also be Honoured with RTI Citizen Award during the Seminar RSVP Dr. Vishnu Rajgadia, State Chapter Head, MICCI Balram, President, Jharkhand RTI Forum

Monday, October 5, 2009

पचास नागरिकों को आरटीआइ सिटीजन अवार्ड विष्णु राजगढ़िया झारखंड आरटीआइ फोरम ने आरटीआइ सिटीजन अवार्ड के लिए पचास नागरिकों का चयन किया है। इन्हें सूचनाधिकार की चैथी वर्षगांठ पर आरटीआइ सप्ताह के दौरान 11 अक्तूबर 2009 को होटल चिनार, रांची में सम्मानित किया जायेगा। इनमें कई पूर्व विधायक, पूर्व सांसद व पूर्व मंत्री भी शामिल हैं। सूची इस प्रकार है- श्री रमेंद्र कुमार, श्री सरयू राय, श्री रामचंद्र केसरी, श्री विनोद कुमार सिंह, श्री अरूप चटर्जी, श्री लक्ष्मण गिलुआ, श्री गंगा टाना भगत, श्री रामजीलाल सारडा, श्री विक्की कुमार, सुश्री रंजू कुमारी, श्री प्रकाशचंद्र चंदन, श्री कृपासिंधु बच्चन, मो. अनवर, श्रीमती सावित्री देवी, श्री बिंदुभूषण दुबे, श्री बुधु सिंह, श्रीमती आशा देवी, श्री दीपक लोहिया, श्री राणा प्रताप, डाॅ पीसी राम, श्री रामानुज प्रसाद, श्री अमरेंद्र कुमार, श्री सुनील महतो, श्री अमित झा, श्री प्रकाष हेतमसरिया, श्री कमल अग्रवाल, श्री विनोद ठाकुर, श्री संदीप आनंद, श्री कृष्ण मुरारी शर्मा, श्री अरूण कुमार सिंह, श्री ललित बाजला, श्री एके जैन, श्री रंजीत कुमार सिंह, श्री राजकुमार मुरारका, श्री रणधीर निधि, श्री संजीत अग्रवाल, श्री शशिभूषण पाठक, श्री कुंदन गोप, ओमप्रकाश चैधरी, श्री मनोज नारसरिया, मोहम्मद जफर आलम, श्री ओमप्रकाश पाठक, श्री आरके नीरद, श्री आनंद किशोर पंडा, श्री श्यामबली प्रसाद, श्री जयसिंह पूर्ति, श्री सुखलाल, श्री केदारनाथ लाल दास, श्री देवनंदन प्रसाद, श्री संजय नगदुआर।